नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
‘श्री भक्तमाल’ के करीब-करीब सभी संस्करणों में आम तौर पर संक्षेप में हो या विस्तार से, कथा का क्रम सत युग में हुए भगवान के भक्तों से शुरू होता है। फिर त्रेता युग और द्वापर युग में हुए भगवद् भक्तों के प्रसंगों, उनके जीवन चरित्रों से होता हुआ, कलि युग में हुए भक्तों की कहानियों तक आता है। जैसे- श्री नाभादास जी ने मूल ‘श्री भक्तदाम’ ग्रंथ में शुरू के 26-27 छप्पयों (छह-छल पंक्तियों के छंद) में सत युग, त्रेता युग और द्वापर युग में हुए भगवान के भक्तों का चरित्र कहा है। इसी तरह, श्री प्रियादास जी ने ‘श्री भक्ति रस बोधिनी’ नामक टीका में करीब 105 कवित्तों में इन तीनों युगों के भक्तों के प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया है। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘भक्तमाल’ ग्रंथ में तो लगभग 300-350 पन्नों में तीनों युगों के भक्तों के चरित्रों को कहा गया है। हालाँकि इस ‘सरल भक्तमाल’ श्रृंखला में हम सीधे कलि युग में भक्तों के चरित्रों, उनके जीवन-प्रसंगों को कहने जा रहे हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल हो सकता है कि यह निर्णय क्यों लिया गया आखिर? तो इसका जवाब भी श्रृंखला की मूल परिकल्पना की तरह ही ‘सरल’ है।
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श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:। श्री राधा-कृष्ण को समर्पित। श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।
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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
9 – ‘सरल भक्तमाल’- 9…: प्रियादास कौन थे, उन्होंने भक्तमाल-टीका 90 साल बाद कैसे लिखी?
8 – ‘सरल भक्तमाल’- 8…: श्री नाभादास जी का यह नाम कैसे पड़ा, और इसका मतलब क्या है?
7 – ‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?
6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?
