Shri Bhaktmal

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम जप, आदि की सुविधा उसके सरलतम रूप में होने पर भी सामान्य मनुष्य सच्चे अर्थों में यह सब कर नहीं पाते। निश्चित रूप से भगवान को भी इसका भान रहता है। तभी तो वह कलि युग में होने वाले अपने ‘सच्चे भक्तों’ की रक्षा, संरक्षा के लिए इस काल की शुरुआत में ही वैष्णव भक्ति के प्रचार-प्रसार, विस्तार के लिए खुद सम्प्रदाय व्यवस्था का निर्माण कर देते करते हैं। ‘श्री भक्तमाल’ ग्रंथ के अध्ययन के क्रम में जैसे ही हम कलि युग में हुए भक्तों के चरित्रों की ओर बढ़ते हैं, हमें इस बात का अनुभव हो जाता है। शुरू में ही हमें पता चल जाता है कि वास्तव में कोई तर्क चाहे जितने और जिस तरह के भी देता रहे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं। इन्हें भगवान नारायण के चतुर्व्यूह रूप की तरह देखा जाता है।

बहुत से लोगों को पता होगा कि भगवान श्री नारायण हमेशा पृथ्वी पर चतुर्व्यूह रूप में पूर्ण अवतार लेते हैं। इस चतुर्व्यूह रूप में पहले हैं स्वयं वासुदेव। यही पूर्ण ब्रह्म हैं। काल से परे, परम सत्य, परम आत्मा, परम चेतना। यही श्री विष्णु हैं, यही राम हैं, यही श्री कृष्ण हैं। सृष्टि का संरक्षण इन्हीं से होता है। इन्हीं का दूसरा रूप हैं, संकर्षण। यही अनंत हैं, शेष हैं, महाकाल हैं, शिव हैं, रुद्र हैं, लक्ष्मण हैं और बलराम भी। सृष्टि के अंत में उसे समेटना और अगले क्रम की शुरुआत होने तक पूरे ज्ञान और चेतना को सहेजकर रखना, फिर उचित समय आने पर उसका प्रसार करने की जिम्मेदारी यही सँभालते हैं। फिर तीसरे हैं, प्रद्युम्न। इन्हें ‘मन-बुद्धि’ का प्रतीक मानते हैं। अनंत ब्रह्माण्ड की मानसिक और भौतिक सृष्टि करने का काम इन्हें के जिम्मे आता है। यह काम कौन करता है? श्री ब्रह्मा जी न? जो भगवान वासुदेव की नाभि से निकले कमल से पैदा होते हैं। द्वापर युग में यही भगवान श्री कृष्ण के पुत्र होते हैं, इसी नाम से। इस क्रम में चौथे हैं, अनिरुद्ध। ब्रह्माण्ड का पालन, ऋतु चक्र को नियंत्रित करना, सभी क्रियाओं को गति देना, शक्ति देना, यह इनका काम है। इसलिए शक्ति और तेज के गुण इनमें प्रधान होते हैं। किसकी तरह? आदि शक्ति की तरह, जो सृष्टि की शुरुआत में सबसे पहले ब्रह्मा जी के आवाहन पर प्रकट होती हैं। और गौर कीजिए, द्वापर में यही प्रद्मुम्न के पुत्र अनिरुद्ध रूप में भगवान श्री कृष्ण के पौत्र भी होते हैं।

इस चतुर्व्यूह रूप से ही फिर त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिदेवियों (सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती) के रूप सामने आते हैं और सृष्टि आगे-आगे बढ़ती है। सनातन परम्परा के ‘पंचरात्र’ आगम जैसे ग्रंथों में ऐसे तमाम वर्णन विस्तार से उपलब्ध हैं। यहाँ इनका संक्षेप में जिक्र करने का मकसद सिर्फ इतना है कि भगवान श्री नारायण के सम्पूर्ण चतुर्व्यूह रूप से अलग कुछ नहीं है। और इसी चतुर्व्यूह स्वरूप ने खुद, वैष्णव भक्ति के चार मूल सम्प्रदायों की शुरुआत की है, विशेष रूप से कलि युग में भक्ति मार्ग को पुष्ट करने के लिए, भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए और भक्तों के कल्याण के लिए। तो फिर चार मूल सम्प्रदाय कौन-कौन से हैं? इनमें पहला है- ‘श्री’ सम्प्रदाय। कहते हैं, भगवान श्री नारायण की प्रेरणा से इस सम्प्रदाय की शुरुआत खुद माता लक्ष्मी ने की है। इसीलिए इसका नाम ‘श्री’ सम्प्रदाय पड़ा। इस सम्प्रदाय की अधिष्ठात्री देवी भी वही हैं। यही सम्प्रदाय आगे परम्परा में हुए महान् संतों के योगदान के कारण रामानुज और रामानंदी सम्प्रदायों के रूप में भी जाना गया।

इस क्रम में दूसरा है- रुद्र सम्प्रदाय, जिसकी शुरुआत भगवान रुद्र ने की। श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जैसे महान् संत इस सम्प्रदाय की परम्परा में हुए। इसी को पुष्टि मार्गी सम्प्रदाय भी कहते हैं, क्योंकि ‘भगवान की कृपा में ही पुष्टि है’, यह सूत्र वाक्य इस परम्परा के मूल में रहता है। तीसरा- ब्रह्म सम्प्रदाय, जिसका बीज श्री ब्रह्मा ने डाला और श्री मध्वाचार्य जी जैसे आचार्यों ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। इसी तरह चौथा है- सनकादिक सम्प्रदाय। इसे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान श्री नारायण के अवतार सनक, सनंदन, सनत कुमार,…. ने शुरू किया। निम्बार्काचार्य जैसे महान् संत ने इस सम्प्रदाय का इतना प्रसार किया कि यह निम्बार्क सम्प्रदाय भी कहालाने लगा।

श्री राधाकृष्णार्पणम् अस्तु, श्री राधा-कृष्ण को समर्पित…, श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:, श्री राधा-कृष्ण को प्रणाम।

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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)

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श्रृंखला की पिछली 10 कड़ियाँ

10 – ‘सरल भक्तमाल’- 10..: अब हम सीधे कलियुग में हुए भगवान के भक्तों के चरित्र क्यों कहेंगे?
9 – ‘सरल भक्तमाल’- 9…: प्रियादास कौन थे, उन्होंने भक्तमाल-टीका 90 साल बाद कैसे लिखी?
8 – ‘सरल भक्तमाल’- 8…: श्री नाभादास जी का यह नाम कैसे पड़ा, और इसका मतलब क्या है?
7 – ‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?
6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?

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