‘राम इक दिन चंग उड़ाई’…..बालकांड तो क्या, पूरे रामचरित मानस में ये चौपाई है कहाँ?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से

आज मकर संक्रान्ति हो गई। देश के कई इलाक़ों में इस रोज़ पतंग उड़ाए जाने की परम्परा है। उसका भी पालन हुआ। इसके साथ ही धर्म, संस्कृति, साहित्य, संगीत (ख़ास तौर पर अच्छा) जैसे विषयों के साथ खिलवाड़ करने की परम्परा, जो हिन्दुस्तानी मीडिया में जड़ें जमा चुकी है, उसका भी हर तरफ़ बख़ूबी पालन किया गया। यह बात इसलिए लिखने की ज़रूरत लगी क्योंकि इन सभी विषयों को हिन्दुस्तानी मीडिया बेहद हल्के में लिए जाने वाला मानता रहा है। मानता है। यानि ऐसे, जिनमें गम्भीरता से लिखने-पढ़ने की ज़रूरत होती ही नहीं। बल्कि ऐसा करने वालों के बारे में ये धारणा बना ली जाती है कि वे अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं। साथ में यह भी माना जाता है कि इन विषयों में आम पाठकों की विशेष रुचि भी नहीं होती। निश्चित रूप से यही वह धारणा है, जिसके कारण लाखों रुपए की तनख़्वाह लेने वाले नामी सम्पादक भी इन विषयों पर सिर्फ़ कही-सुनी बातों के आधार पर लिख डालते हैं। 

उदाहरण- मकर संक्रान्ति से जुड़े पतंग-प्रसंग का ही है। ख़ुद को सबसे अधिक ‘प्रतिष्ठित’, ‘विश्वसनीय’, ‘सर्वाधिक प्रसार संख्या’ वाले तमग़े देने वाले मीडिया के तमाम उपक्रमों ने हर साल की तरह आज फिर जोर-शोर से बताया कि संक्रान्ति पर सबसे भगवान श्री राम ने अपने भाईयों के साथ पतंग उड़ाई थी। तब से इस परम्परा का पालन किया जा रहा है। अपने इस ‘ज्ञान’ की पुष्टि के लिए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी और उनके ‘श्री रामचरित मानस’ का हवाला भी दिया। बताया कि रामचरित मानस के बालकांड में एक चौपाई है, “राम इक दिन चंग उड़ाई। इन्द्रलोक में पहुँची जाई॥” मतलब- रामचंद्र जी ने पतंग उड़ाई तो वह सीधे इन्द्रलोक जा पहुँची।

फिर इसमें आगे कहानी बताई गई कि पतंग उड़ाने के दौरान रामचंद्र जी और उनके भाइयों के साथ बालक-हनुमान जी भी थे। इन्द्रलोक में इंद्र के पुत्र जयन्त की पत्नी ने भगवान राम की पतंग पकड़ ली। उसे देखकर वे आकर्षित हो गईं और पतंग उड़ाने वाले के बारे में सोचने लगीं, “जासु चंग अस सुन्दरताई। सो पुरुष जग में अधिकाई॥” तब श्री राम ने बालक-हनुमान जी को उनके पास भेजा। उन्होंने जयन्त की पत्नी से वादा किया कि भगवान श्री राम एक दिन उन्हें दर्शन ज़रूर देंगे। इसके बाद जयन्त की पत्नी ने वह पतंग छोड़ दी। “तिन तब सुनत तुरन्त ही, दीन्ही छोड़ पतंग। खेंच लइ प्रभु बेग ही, खेलत बालक संग।” तो इस तरह यह पतंग-प्रसंग लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ में स्थापित करने की कोशिश कर ली गई। जबकि सच ये है कि तुलसीदास जी द्वारा रचित किसी अन्य ग्रन्थ में यह प्रसंग हो तो हो, मगर श्री रामचरित मानस में बिल्कुल भी नहीं है। वैसे, तुलसीदास के किसी अन्य ग्रन्थ में ये चौपाईयाँ होंगी, इसकी भी सम्भावना कम ही है क्योंकि शुरू की दो चौपाईयों को पढ़कर देखिए। ये दोनों ही तुलसीदास जी की चौपाई लेखन-शैली के मीटर में फिट नहीं बैठतीं। यानि इन्हें ठीक तरह से तुक मिलाकर गाने में ज़ुबान अटकती है।

अब बात श्री रामचरित मानस की। तो इसके बालकांड में कुल 361 दोहे (सोरठा, छन्द मिलाकर) हैं। इनमें दोहा संख्या- 192 से 205 तक भगवान के जन्म, बाललीलाओं, शिक्षा-दीक्षा, आदि का वर्णन है। इनमें कहीं भी ‘चंग’ का उल्लेख नहीं मिलता। ‘पतंग’ शब्द है, लेकिन सूर्यदेव के लिए क्योंकि ‘पतंग’ का एक अर्थ सूर्य भी होता है, “कौतुक देखि पतंग भुलाना, एक मास तेहि जात न जाना।।” अर्थात् भगवान के जन्म का कौतुक देखकर एक महीने के लिए सूर्यदेव आसमान पर ठहर से गए थे।… इसके बाद दोहा संख्या- 206 से श्री राम के ऋषि विश्वामित्र के साथ जाने का प्रसंग शुरू हो जाता है। इससे आगे उत्तरकांड में गरुड़ और काकभुसुंडि (मानस में ऐसे ही लिखा है) सम्वाद के दौरान भगवान के पूरे लीला-चरित्रों का फिर संक्षेप में वर्णन मिलता है। लेकिन वहाँ भी ‘चंग’ या ‘पतंग’ का उल्लेख नहीं है। भगवान के बालरूप के साथ जब काकभुसुंडि अपने मन-रंजन को याद करते हैं, तब भी नहीं।

इतना ही नहीं, श्री रामचरित मानस के मुताबिक, श्री राम और श्री हनुमान जी की पहली बार भेंट भी तब होती है, जब माता सीता को खोजते हुए भगवान रिष्यमूक पर्वत के पास पहुँचते हैं। वहाँ पर सुग्रीव अपने भाई बालि के डर से छिपे हुए हैं। तभी उनकी नज़र श्री राम और श्री लक्ष्मण पर पड़ती है। तपस्वी भेष। हाथ में धनुष-बाण। तब सुग्रीव श्री हनुमान जी से कहते हैं, “अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।” मतलब- हे हनुमान, तुम बटुक रूप रखकर जाओ और देखो कि ये तपस्वी युगल कौन हैं। इन्हें देखकर मैं भयभीत हो रहा हूँ।… श्री राम जी और श्री हनुमान जी के मिलन का यह प्रसंग किष्किंधाकांड के पहले और दूसरे और दोहे में ही कहा गया हैं। इससे पहले ऐसा कोई उल्लेख श्री रामचरित मानस में नहीं मिलता, जब श्री हनुमान जी और श्री रामचंद्र जी की भेंट हुई हो। मुलाक़ात हुई हो। 

लिहाज़ा, स्वाभाविक सवाल ये हैं कि हिन्दुस्तानी मीडिया के ‘मूर्धन्य सम्पादक’ अपने ही धर्म, संस्कृति, साहित्य को इतने ग़ैर-ज़िम्मेदारी के भाव से क्योंं लेते हैं? वे इन मसलों पर थोड़ा अध्ययन कर लोगों तक सही जानकारियों पहुँचाने की कोशिश क्यों नहीं करते? और अगर इन विषयों पर लगाने के लिए उनके पास वक़्त नहीं है, तो वे इनके बारे में लिखते ही क्यों हैं? वैसे, मालूम है कि इन सवालों के उत्तर कोई देगा नहीं। कोई इनका संज्ञान लेगा, इसकी उम्मीद भी नहीं ही है। पर फिर भी, कितना बेहतर हो, अगर कोई ऐसे विषयों के बारे में सोचे। इस किस्म की भ्रान्तियों को फैलने-फैलाने का सिलसिला रोके। सही तथ्यों को, सही परिप्रेक्ष्य में सामने लाने की कोशिश करे!

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Neelesh Dwivedi

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  • आप से पूर्णतः सहमत हूँ, पतंग उड़ाने का प्रसंग रामचरित मानस के बालकांड में नही मिलता है, किंतु सभी पोर्टल पर कॉपी पेस्ट चल रहा है।

    • बहुत शुक्रिया आलोक भाई कि आपने कम से कम प्रतिक्रिया सार्वजनिक तो की। वरना दीगर लोग तो ग़लत को ग़लत मान लेना भी अपनी शान के ख़िलाफ़ ही समझते हैं।

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